चित्रकला म ें र ंगा ें का अर्थ एव ं महत्व: प्रतीकात्मक रूप म ें
Main Author: | प्रतिमा, शोधार्थी |
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Format: | Article Journal |
Terbitan: |
, 2017
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Subjects: | |
Online Access: |
https://zenodo.org/record/890573 |
Daftar Isi:
- वर्ण संतुलन का अर्थ चित्र में वर्णों का सुव्यवस्थित संया ेजन। अर्था त् चित्रकला में रंग एक बड़ा विषय ह ै और चित्र में रंगा ें की संया ेजना बह ुत ही महत्वपूर्ण है। भारतीय चित्रकला में रंगा ें का महत्व प ्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक रहा ह ै। चित्रकला में कलाकार के आंतरिक भावों की अभिप ्रेरणा चित्रों के माध्यम से प ्रदर्शित होती ह ै। कला चित्रकार के मना ेभावों में जन्म लेती ह ै। यह मन की अचेतन अज्ञात गहर्राइ यों से ही विकसित होती ह ै। इन भावनाओं का े साकार रूप में परिवर्तित करने में चित्र महत्वपूर्ण माध्यम रहा ह ै। रंगा ंे का अपना ही अलग महत्व रहा है इसके साथ ही रंगा ें की अपनी भावभंगिमा व भाषा हा ेती ह ै, इनका मानवीय भावनाआ ें से गहरा संबंध हा ेता ह ै। भारतीय सा ैन्दर्य-दर्श न में चित्रा ें में वर्णि त रंगा ें का अर्थ अलग-अलग ह ै, जैसे- सफ ेद रंग शा ंति और सात्विकता का प ्रतीक, लाल शा ैर्य और वीरता का प्रतीक, काला बुराईयों व मानसिक व ृत्तियों इत्यादि। चित्रकला में प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक रंगा ें के प ्रयोग का माध्यम भिन्न-भिन्न रहा ह ै, जैसे- प ्राकृतिक रंग, खनिज रंग, एक्रेलिक रंग, जलरंग आदि। अभी तक इन सभी माध्यमों में चित्रकार द्वारा चित्रा ें में रंग भरे जाते रहे ह ैं। इसके उदाहरणा ें में अजन्ता में फ्रेस्का े चित्रण शैली, मुगलकालीन पहाड़ी, राजस्थानी टेम्परा, प ुनर्जा गरणकाल जलरंग आदि। चित्रों में उपर्यु क्त रंगा ें का प ्रयोग कर चित्र में सौन्दर्य, लावण्य व भावा ें का निरूपण होता ह ै, जिस कलाकार बह ुत ही तन्मयता व अ ंतःप ्र ेरणा से प ्रेरित हा े रंगा ें का े विभिन्न चित्रों के माध्यम से प ्रदर्शि त करता ह ै। रंग चित्र म ें चित्रकार के भावा ें का े उदीप्त करता है। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा कला के प ुनर्जागरण व चित्र-सृजन के ज्ञान ह ेतु “इण्डियन सोसायटी आॅफ ओरिएन्टल आर्ट” के प्रकाशन के अंतर्गत ‘षडांग’ नामक प ुस्तिका में ‘कामसूत्र’ में वर्णि त 64 कलाओं में चा ैथे स्थान पर ‘आलेख्य चित्रकला’ के सन्दर्भ में चित्रकला के छः अंगा ें के बारे में विस्तृत विवेचना की है। इन छः अ ंगा ें में छठ े क्रम में वर्णि काभंग अर्थात् रंगा ें के चित्र मे ं महत्व का े दर्शा या गया ह ै। इसमें चित्रकार द्वारा चित्रण प ूर्ण रंग संया ेजन का ज्ञान, उनकी प्रतीकात्मक, अर्थ व नियमों का विस्तृत विवेचन ह ै। इसी प ्रकार नाट्यशास्त्र में कहा गया ह ै कि- ‘वर्ण नाम तु विधिम् गत्वा तथा प ्रकृतिमेव च कुर्या दंगस्य रचनाम्’, अर्था त् वर्ण की विधि और प्रकृति को समझकर ही आकृति को बनाना चाहिए। इससे कलाकार में कला-का ैशल का विकास व दर्श क को चित्रकला में रंगा ें क े महत्व का बोध होता ह ै।